बड़ी मुददत के बाद फिर वो चेहरा नजर आया
हमें देखके न जाने क्यों उसने पर्दा गिराया
वैसे तो कैद थे हम अपनी पाक वफदारीमें
क्यों खांक लम्होंकी कस्मोंमे हमकों चुनवाया
हमनें तो छोड़ दी थी हसरत साकी को पाने की
न जाने फिर क्यों साकियाँ गिरेबाँ तक आया
हमतो वैसेही बेदखल थे उनकी अहले सल्तनतसे
सपना न जाने क्यों उनका हमें अक्सर आया
उनकी यादें गुलशन है दर्दे सेहरा में
न जाने क्यों फिर एक आंसू उभर आया
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