शनिवार, १५ डिसेंबर, २०१८

चेहरा



बड़ी मुददत के बाद फिर वो चेहरा नजर आया 
हमें देखके न जाने क्यों उसने पर्दा गिराया 

वैसे तो कैद थे हम अपनी पाक वफदारीमें 
क्यों खांक लम्होंकी कस्मोंमे हमकों चुनवाया 

हमनें तो छोड़ दी थी हसरत साकी को पाने की 
न जाने फिर क्यों साकियाँ गिरेबाँ तक आया 

हमतो वैसेही बेदखल थे उनकी अहले सल्तनतसे 
सपना न जाने क्यों उनका हमें अक्सर आया 

उनकी यादें गुलशन है दर्दे सेहरा में
न जाने क्यों फिर एक आंसू उभर आया 

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